Thursday, July 14, 2016

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साल बदलता है, दिन बदलता नहीं
इस शहर का सूरज, रात में भी ढलता नहीं
गुफ्तगू क्या होगी इन महफ़िलो में साहब
सब कहते हैं, कोई सुनता नहीं
तेरी याद, तेरी बात, तेरा चेहरा,और वो रात
कुछ भी तो दिल से निकलता नहीं
बड़ा सख्त है मेरा नसीब लिखने वाला
लाख रोने से भी बेदर्द पिघलता नहीं
मुझको मुक़द्दर की दुहाई न दे दोस्त
खुदा और मोहब्बत आदमी चुनता नहीं
तू बन तो बन चाँद के मानिंद
तारे कई हैं , कोई गिनता नहीं

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