Sunday, April 6, 2014

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ए खुदा इतनी सी तू मुझ पे इनायत कर दे
मेरे कातिल कि भी मेरी सी हालत कर दे !

मेरे दुश्मन तेरे सजदे में झुके हैं शायद
मान ले उनकी दुआ थोड़ी सियासत कर दे !

कभी महबूब था जो आज है मुंसिफ मेरा
चलो अछा है निगाहों को अदालत कर दे !

अब तो दिल भी मेरा मुझसे खफा रेहता है,
जाने किस रोज़ कमबख्त बगावत कर दे !

तेरे अहसान किसी रोज़ चुका दूंगा मैं -
कभी टूटे हुये रिश्तों की तिज़ारत कर दे !

तू तो काफिर भी नहीं है , नमाज़ी भी नहीं
अब जो करनी है तो महबूब ए इबादत कर दे !

यूं नहीं देख उसे छुप के भरी मेहफिल मे
उसकी आँखें न उसके दिल से शिकायत कर दे !

बड़े साहेब बने फिरते हो शहर ए  दिल्ली में ,
वक़्त का क्या है किस रोज़ क़यामत कर दे  !