Tuesday, September 24, 2013

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 उसके तुम पर भी एहसान है क्या,
 कल खुदा  था आज इन्सान है क्या ?
 मेरे मुकद्दर का मसीहा कहने वाले ,
तू  मेरे नाम से भी अनजान है क्या?

तुझसे बिछड के सोचा था मौत आएगी
फरिश्तो में भी कोई बेइमान है क्या?
कुबूल है आना इस रात तेरे घर में
बस ये बता दो - सामान है क्या ?

चल पड़ा दूर तक आदत बदल बदल के
मोहब्बत का सफ़र आसान है क्या ?
क्यों खुश हूँ तेरी तड़प से जाने
मेरे अन्दर भी कोई शैतान है क्या ?



3 comments:

  1. तुझसे बिछड के सोचा था मौत आएगी
    फरिश्तो में भी कोई बेइमान है क्या?..

    फ़रिश्ते जानते हैं उनसे मुलाक़ात तय है आपकी ... भावपूर्ण रचना ...

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  2. बहुत उम्दा प्रस्तुति ...!

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