Monday, January 18, 2010

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यह  बात बड़ी बेमानी है, सांसो का मोल नहीं होता
ये जानने वाले जानते है, जीवन अनमोल नहीं होता..

शब्दों के अपने अर्थ हुए, अर्थों  क़ि अपनी परिभाषा
पर परिभाषा के मंथन में, शब्दों का मोल नहीं होता.

वो रेखाओं से हार गया, बस सपने उसके साथ रहे
इन हालातों के साये में, सपनो का मोल नहीं होता

उन संबंधो का छल कैसा ,जिन  संबंधो का नाम नहीं
इस रंग बदलती दुनिया में, रिश्तो का मोल नहीं होता

वो डूब गया जो सूरज था, और उगने वाला भी सूरज
जब रात को रोज़ अमावास हो,तारो का मोल नहीं होता

8 comments:

  1. शब्दों के अपने अर्थ हुए, अर्थों क़ि अपनी परिभाषा
    पर परिभाषा के मंथन में, शब्दों का मोल नहीं होता

    सच कहा है हितेश जी ........ जब परिभाष जैसी बड़ी बाते होती हैं तो शब्दों का मोल ख़त्म हो जात है .........

    उन संबंधो का छल कैसा ,जिन संबंधो का नाम नहीं
    इस रंग बदलती दुनिया में, रिश्तो का मोल नहीं होता
    बहुत लाजवाब लिखा है ..... रिश्ते आज ख़त्म हो गये हैं ...........

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  2. बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने! हर एक पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी ! इस लाजवाब और बेहतरीन रचना के लिए बधाई!

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  3. hitesh ji
    bahut hi sundar rachna
    bahut bahut abhar

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  4. सुंदर भाव !

    कृपया सेटिग्स से वर्ड वेरिफिकेशन को डिसएबल करदें

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  5. लिखते रहें !!

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  6. badhiya likha hai...keep writing....

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  7. ये उम्र और ये तेवर , बहुत सुन्दर लिखते हैं आप !

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  8. I don't know how to type in Hindi here but all i wanted to say is, the last lines were beautiful. Moreso, they were honest. Kudos!

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