Thursday, July 14, 2016

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तेरी नज़र , नज़ारे बहुत हैं.
समंदर एक है, किनारे बहुत हैं
यारों पे अख्तियार रखता हूँ
गिर भी गया तो सहारे बहुत हैं
छोड़ दो लफ्ज़ इस शाम में
दो आँखें हैं, इशारे बहुत हैं
कोई उम्मीद नहीं सच की साहब
इस शहर में तुम्हारे बहुत हैं ,
चाँद मुबारक हो आशिक़ों को
मेरे इश्क़ को सितारे बहुत हैं 

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साल बदलता है, दिन बदलता नहीं
इस शहर का सूरज, रात में भी ढलता नहीं
गुफ्तगू क्या होगी इन महफ़िलो में साहब
सब कहते हैं, कोई सुनता नहीं
तेरी याद, तेरी बात, तेरा चेहरा,और वो रात
कुछ भी तो दिल से निकलता नहीं
बड़ा सख्त है मेरा नसीब लिखने वाला
लाख रोने से भी बेदर्द पिघलता नहीं
मुझको मुक़द्दर की दुहाई न दे दोस्त
खुदा और मोहब्बत आदमी चुनता नहीं
तू बन तो बन चाँद के मानिंद
तारे कई हैं , कोई गिनता नहीं

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न कुछ अाता है, न कुछ जाता है
सच वो है, जो राजा बताता है ,
मदारी के पैर मे घुंगरू हैं
और बंदर डुगडुगी बजाता है
वो सियासत मे बस पियादा है
भीड़ मे जो नारे लगाता है
वो बात करेंगे मुस्तकबिल की
बात करने मे क्या जाता है
बस मैला हो के ही निकला
इस हमाम मे जो भी नहाता है
कल उसको भूख से मरते देखा
वो शख्श जो रोटिया उगाता है

Wednesday, March 18, 2015

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सच बोल के हम सब के गुनाहगार हो गए
मेरे शहर के लोग समझदार हो गए
कह के चले थे मुल्क को बदलेंगे एक रोज़
वो आदमी जो भीड़ में शुमार हो गए !

हमने सुना है रात वो आया था इस गली
उसकी नज़र के हम भी इक शिकार हो गए
जिसको भुलाने पी गए हम सारा मैकदा
वो मिल गया तो मै  के तलबगार हो गए !

पूछे कोई तो बोलना की मर गया साहिब
जो सच कहा तो दोस्त भी मक्कार हो गए
जिनके ज़मीर और जवानी पे दाग है
वो लोग इस निज़ाम में सरकार हो गए !

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शहर ए  दिल्ली में असरदार कितने हैं ,
उसकी बातों से खबरदार कितने हैं.
मज़हबी रंग में बनती बिगड़ती सरकारें ,
जम्हूरियत में समझदार कितने हैं।

मुफ़लिसी के दौर में नज़र आया ,
दोस्तों में मददगार  कितने हैं
चोर को चोर कहना गुनाह है साहब
निज़ाम गिनता है - गुनहगार कितने हैं

लूट गयी आबरू सरे बाज़ार फिर से
हुक्मराँ ए हिंद लाचार कितने हैं।
वो सियासत में दोस्त कहता है ,
दिल से पूछ वफादार कितने हैं 

Sunday, April 6, 2014

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ए खुदा इतनी सी तू मुझ पे इनायत कर दे
मेरे कातिल कि भी मेरी सी हालत कर दे !

मेरे दुश्मन तेरे सजदे में झुके हैं शायद
मान ले उनकी दुआ थोड़ी सियासत कर दे !

कभी महबूब था जो आज है मुंसिफ मेरा
चलो अछा है निगाहों को अदालत कर दे !

अब तो दिल भी मेरा मुझसे खफा रेहता है,
जाने किस रोज़ कमबख्त बगावत कर दे !

तेरे अहसान किसी रोज़ चुका दूंगा मैं -
कभी टूटे हुये रिश्तों की तिज़ारत कर दे !

तू तो काफिर भी नहीं है , नमाज़ी भी नहीं
अब जो करनी है तो महबूब ए इबादत कर दे !

यूं नहीं देख उसे छुप के भरी मेहफिल मे
उसकी आँखें न उसके दिल से शिकायत कर दे !

बड़े साहेब बने फिरते हो शहर ए  दिल्ली में ,
वक़्त का क्या है किस रोज़ क़यामत कर दे  !






   

Tuesday, September 24, 2013

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 उसके तुम पर भी एहसान है क्या,
 कल खुदा  था आज इन्सान है क्या ?
 मेरे मुकद्दर का मसीहा कहने वाले ,
तू  मेरे नाम से भी अनजान है क्या?

तुझसे बिछड के सोचा था मौत आएगी
फरिश्तो में भी कोई बेइमान है क्या?
कुबूल है आना इस रात तेरे घर में
बस ये बता दो - सामान है क्या ?

चल पड़ा दूर तक आदत बदल बदल के
मोहब्बत का सफ़र आसान है क्या ?
क्यों खुश हूँ तेरी तड़प से जाने
मेरे अन्दर भी कोई शैतान है क्या ?